हसरतों की कब्र में , एक रूह दफन हो गयी ..
वोह आग को लगा गले , एक आह ओढ़े सो गयी ...
आंसुओं से आसमान के , धुल गयी ज़मीन तेरी ..
कि बादलों की साजिशों में , घुल गयी ज़मीन तेरी ...
किस फ़कीर कि मज़ार पे , अब चादरें चधाऊँ मैं ?
किस शौख के बाज़ार में , दिलचस्पियाँ जताऊँ मैं ?
पुछा जो कल कि रात से , वोह बोली क्या बताऊँ मैं ?
क्यूँ इस सवेरे के आगे , फिर आज सर झुकाऊँ मैं ?
क्यूँ आज जलती लौ से लड़ पड़ी हैं यह हवाएं फिर ?
क्यूँ अब दुआ की राह देखती हैं यह दवाएं फिर ?
भूले हुए गुनाहों की , क्यूँ मिल रहीं सजाएं फिर ?
क्यूँ हंस रहीं हैं आज रेगिस्तान की फिज़ाएं फिर ?
एक आस मेरी थी कभी , तनहाइयों में खो गयी ,
एक सांस मेरी थी कभी , गवाहियों में खो गयी ,
एक रात कि जो बात थी , कहानियों में खो गयी ,
एक अक्स है , छुपाने को , परछाइयों में खो गयी .





